हर मोड़ पे सफर में जिन्दगी के
आजकल करवट बदल लेती है जिन्दगी
नयी दिशा उठा लेती है
शरीर का बोझा,
दो कदमो के सहारे....
और -
मैं पाती हूँ अपने आप को एक ऐसी जगह,
जहा से नजर भी नहीं आते किनारे....
तब -बहुत दूर निकल जाती हूँ
किनारे की तलाश में
पर कुछ नहीं आता हाथ में....
क्योकि -
मंजिल मेरी जिन्दगी की अनजान हैं
किनारों से न अपनी जरा भी पहचान है .........
( "प्राची" की कलम से )
Tuesday, October 6, 2009
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